हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,महीन ए शाबान-अल-मोअज्जम में नमाज़-ए-इशा के बाद मस्जिद इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम, नूर-ए-इलाही कॉलोनी दिल्ली में एक मजलिस-ए-अज़ा का आयोजन किया गया। यह मजलिस मरहूम अब्बास इब्न मुर्तज़ा हसन के ईसाल-ए-सवाब के लिए मुनअकिद की गई थी।
मजलिस में मौलाना ने खुत्बा-ए-शाबानिया की रौशनी में महीने-ए-रमज़ान-उल-मुबारक की फज़ीलत, उसकी रूहानी अहमियत और अख़लाक़ी तरबियत से उसके ताल्लुक़ पर तफ्सीली रोशनी डाली।
इस मौके पर मौलाना हैदर अली जाफरी, इमाम-ए-जमात नूर-ए-इलाही कॉलोनी ने अपने खिताब में फरमाया कि महीना-ए-रमज़ान सिर्फ खाने-पीने या तफरीह का महीना नहीं है बल्कि इबादत, दुआ और अल्लाह से राज-ओ-नियाज का महीना है।

उन्होंने कहा कि अक्सर लोग रमज़ान में सहरी और इफ्तारी के खानों पर ज्यादा तवज्जो देते हैं, लेकिन यह भी जरूरी है कि हम अपने प्रोग्राम में इबादात, दुआओं, इस्तिग़फार और दीनी इल्म हासिल करने को भी शामिल करें।
मौलाना ने मज़ीद कहा कि रमज़ान उल मुबारक में सबसे अहम काम अपने किरदार और अख़लाक को बेहतर बनाना है। रसूल-ए-खुदा का इरशाद नक़्ल करते हुए उन्होंने कहा कि जो शख्स इस महीने में अपने अख़लाक को संवार ले, अल्लाह कयामत के दिन उसे पुल-सिरात से आसानी से गुजरने की इजाज़त अता फरमाएगा। उन्होंने अख़लाक की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि इंसान की कद्र-ओ-मंज़िलत उसके अख़लाक से बढ़ती है और अख़लाक के बगैर दीगर खूबियां भी बे-मानी हो जाती हैं।
उन्होंने मज़ीद बताया कि रसूल-ए-खुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने रमज़ान उल मुबारक में बुजुर्गों का एहतराम और छोटों पर रहम करने की खुसूसी ताकीद फरमाई है, ताकि मुआशरे में मोहब्बत और हमदर्दी को फरोग दिया जा सके।
आखिर में मौलाना ने यतीमी के मफहूम और उसके नफ्सियाती व समाजी असरात पर रोशनी डाली और हज़रत सकीना सलामुल्लाह अलैहा की यतीमी के मसाइब बयान किए, जिस पर हाज़िरीन अश्कबार हो गए। मजलिस में अहल-ए-इलाका की बड़ी तादाद ने शिरकत की और मरहूम के लिए दुआ की।
आपकी टिप्पणी